मुबारक़ हो ! अहल ए वतन क्या ख़ूब
इज्ज़त बख्शी है आलमी अखबारों ने
सोने की चिड़िया को भी इन लोगो ने
खड़ा कर दिया भूखे नंगो की क़तारो में
खुदगर्ज़ी में आईन ए वतन बदल डाले
इन नये ज़म्हुरियत के अलमबरदारो ने
सील दिए हर लब जो थे सच बोलने वाले
दौर ए ज़म्हुरियत के ज़दीद पैरोकारो ने..!!
~नवाब ए हिन्द
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मय ए फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था

आप की आँख अगर आज गुलाबी होगी

ग़म इसका कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया

अगर आज भी बोली ठोली न होगी

जब से तेरी हर बात में रहने लगे

कोई भी दार से ज़िंदा नहीं उतरता है

होंठों पे उसके जुम्बिश ए इंकार भी नहीं

फिर झूम उठा सावन फिर काली घटा छाई…

मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा

कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए
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