मुबारक़ हो ! अहल ए वतन क्या ख़ूब
इज्ज़त बख्शी है आलमी अखबारों ने
सोने की चिड़िया को भी इन लोगो ने
खड़ा कर दिया भूखे नंगो की क़तारो में
खुदगर्ज़ी में आईन ए वतन बदल डाले
इन नये ज़म्हुरियत के अलमबरदारो ने
सील दिए हर लब जो थे सच बोलने वाले
दौर ए ज़म्हुरियत के ज़दीद पैरोकारो ने..!!
~नवाब ए हिन्द
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कहते हो तुम्हें हस्ब ए तमन्ना नहीं मिलता

मुक़म्मल दो ही दानों पर ये तस्बीह ए मुहब्बत है

मैं न कहता था कि शहरों में न जा यार मेरे

उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ

जान ओ दिल हम उन्ही पे निसार करते है…

गुलाब आँखें शराब आँखें

तलब की राहों में सारे आलम नए नए से…

सहमा सहमा डरा सा रहता है…

कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़ ए यार के

ज़बाँ सुख़न को सुख़न बाँकपन को तरसेगा



















