अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फकत उनको सुनाने के लिए हैं,
अब ये भी नहीं ठीक के हर दर्द मिटा दे
कुछ दर्द कलेजें से लगाने के लिए हैं,
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं,
देखूँ तेरे हाथों को तो लगता हैं तेरे हाथ
मंदिर फकत दीप जलाने के लिए हैं,
सोचो तो बड़ी चीज़ हैं तहज़ीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं,
ये इल्म का सौदा ये रिसालें ये किताबें
एक शख्स की यादों को भुलाने के लिए हैं..!!
~जां निसार अख्तर
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