ये शब ये ख़याल ओ ख़्वाब तेरे

ये शब ये ख़याल ओ ख़्वाब तेरे
क्या फूल खिले हैं मुँह अँधेरे,

शोले में है एक रंग तेरा
बाक़ी हैं तमाम रंग मेरे,

आँखों में छुपाए फिर रहा हूँ
यादों के बुझे हुए सवेरे,

देते हैं सुराग़ फ़स्ल ए गुल का
शाख़ों पे जले हुए बसेरे,

मंज़िल न मिली तो क़ाफ़िलों ने
रस्ते में जमा लिए हैं डेरे,

जंगल में हुई है शाम हम को
बस्ती से चले थे मुँह अँधेरे,

रूदाद ए सफ़र न छेड़ नासिर
फिर अश्क न थम सकेंगे मेरे..!!

~नासिर काज़मी

किसी का दर्द हो दिल बे क़रार अपना है

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