कोई अज़्म-ओ-इरादा, नहीं चाहिए
आपसे कोई वादा, नहीं चाहिए,
आपकी रुह में, इश्क़ बनकर रहूँ
इससे कुछ भी ज़ियादा, नहीं चाहिए
~ आँचल सक्सैना
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ये संसद है यहाँ भगवान का भी बस नहीं चलता…

छोड़ कर ऐसे गया है छोड़ने वाला मुझे

नियाज़ ए इश्क़ से नाज़ ए बुताँ तक बात जा पहुँची

अहल ए उल्फ़त के हवालो पे हँसी आती है…

क्या कहते क्या जी में था

ग़म के हर एक रंग से मुझको शनासा कर

जब तेरा हुक्म मिला तर्क ए मुहब्बत कर दी…

बहुत उदास है दिल जाने माजरा क्या है

पिछले बरस तुम साथ थे मेरे…

आंधियाँ भी चले और दीया भी जले…













