किसी का दर्द हो दिल बे क़रार अपना है
हवा कहीं की हो सीना फ़िगार अपना है,
हो कोई फ़स्ल मगर ज़ख़्म खुल ही जाते हैं
सदा बहार दिल ए दाग़ दार अपना है,
बला से हम न पिएँ मय कदा तो गर्म हुआ
ब क़द्र ए तिश्नगी रंज ए ख़ुमार अपना है,
जो शाद फिरते थे कल आज छुप के रोते हैं
हज़ार शुक्र ग़म ए पाएदार अपना है,
इसी लिए यहाँ कुछ लोग हम से जलते हैं
कि जी जलाने में क्यूँ इख़्तियार अपना है,
न तंग कर दिल ए महज़ूँ को ऐ ग़म ए दुनिया
ख़ुदाई भर में यही ग़म गुसार अपना है,
कहीं मिला तो किसी दिन मना ही लेंगे उसे
वो ज़ूद रंज सही फिर भी यार अपना है,
वो कोई अपने सिवा हो तो उस का शिकवा करूँ
जुदाई अपनी है और इंतिज़ार अपना है,
न ढूँढ नासिर ए आशुफ़्ता हाल को घर में
वो बू ए गुल की तरह बे क़रार अपना है..!!
~नासिर काज़मी
इन सहमे हुए शहरों की फ़ज़ा कुछ कहती है
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