जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम ए जाँ बनता गया

जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम ए जाँ बनता गया
सोज़ ए जानाँ दिल में सोज़ ए दीगराँ बनता गया,

रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म ए चमन
धीरे धीरे नग़्मा ए दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया,

मैं अकेला ही चला था जानिब ए मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया,

मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र ए हर ख़ास ओ आम
यूँ तो जो आया वही पीर ए मुग़ाँ बनता गया,

जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला पायान ए शौक़
ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया,

शरह ए ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर
लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया,

दहर में मजरूह कोई जावेदाँ मज़मूँ कहाँ
मैं जिसे छूता गया वो जावेदाँ बनता गया..!!

~मजरूह सुल्तानपुरी

यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं

1 thought on “जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम ए जाँ बनता गया”

Leave a Reply