मिट्टी की सुराही है

मिट्टी की सुराही है
पानी की गवाही है,

उश्शाक़ नहीं हम लोग
पर रंग तो काही है,

हर ग़ुंचा ए लब दरबाँ
हर शाख़ सिपाही है,

सब्ज़े पे खिंचा नक़्शा
और सुर्ख़ सियाही है,

एक साँवली पतझड़ के
पुश्ते पे तबाही है,

उधड़ी हुई क़ब्रों पर
कत्बों की मनाही है,

ऐ काँच की सी पिंडली
ये शहर ए सबा ही है..!!

~आमिर सुहैल

रस्ते में अजब आसार मिले

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