ज़िक्र होता है उस परी वश का
जब भी महफ़िल में बात होती है,
उस की यादों की अंजुमन ही में
दिन गुज़रता है और रात होती है,
सदक़े उतरी है ज़ीस्त इस दिल के
रूह की है मफ़ारिक़त तन से,
इल्तिहाब ए वजूद ख़त्म हुआ
ग़म से दिल को नजात होती है,
लाख पहरे भी हों तो महफ़िल में
बात करने से कैसे रोकेंगे ?
कौन जाने ज़बान ए अहल ए वफ़ा
आँखों आँखों में बात होती है,
लम्हे गुज़रे जो उन की बाहों में
रक़्स कुन अब भी हैं निगाहों में,
उन की ज़ुल्फ़ों की छाँव के नीचे
कितनी दिलकश हयात होती है,
उस की तारीफ़ क्या करें शाहीन
साथ जिस के ख़ुदाई है सारी,
ज़ुल्फ़ संवरी तो दिन निकलता है
ज़ुल्फ़ बिखरी तो रात होती है..!!
~उस्मान शाहीन
अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो
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