ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में

ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में
आग होती जा रही है ज़िंदगानी धूप में,

चाँद की आग़ोश में होने से जिस का है वजूद
खिल सकेगी क्या भला वो रातरानी धूप में,

उस की फ़ुर्क़त की तपिश में मैं झुलस कर रह गई
वर्ना इतनी ताब कब थी आसमानी धूप में,

कुछ चमकता सा नज़र आने लगा है रेत में
बढ़ रही है मेरे क़दमों की रवानी धूप में,

एक साया साथ मेरे हमसफ़र बन कर मिरा
लिख रहा है फिर कोई ताज़ा कहानी धूप में..!!

~चाँदनी पांडे

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