दस्तूर मोहब्बत का सिखाया नहीं जाता

दस्तूर मोहब्बत का सिखाया नहीं जाता
ये ऐसा सबक़ है जो पढ़ाया नहीं जाता,

कमसिन हैं वो ऐसे उन्हें ज़ालिम कहूँ कैसे
मासूम पे इल्ज़ाम लगाया नहीं जाता,

आईना दिखाया तो कहा आईना रुख़ ने
आईने को आईना दिखाया नहीं जाता,

क्या छेड़ है आँचल से गुलिस्ताँ में सबा की
उनसे रुख़ ए रौशन को छुपाया नहीं जाता,

हैरत है कि मयख़ाने में जाता नहीं ज़ाहिद
जन्नत में मुसलमान से जाया नहीं जाता,

अब मौत ही ले जाए तो ले जाए यहाँ से
कूचे से तेरे हम से तो जाया नहीं जाता,

इस दर्जा पशेमाँ मेरा क़ातिल है कि उस से
महशर में मेरे सामने आया नहीं जाता,

पुरनम ग़म ए उल्फ़त में तुम आँसू न बहाओ
इस आग को पानी से बुझाया नहीं जाता..!!

~पुरनम इलाहाबादी

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