यूँ बने सँवरे हुए से फूल हैं गुलज़ार में
सैर को निकली हों जैसे लड़कियाँ बाज़ार में,
ये तेरा हुस्न ए तकल्लुम ये तेरा हुस्न ए बयाँ
टूटने लगते हैं आईने तेरी गुफ़्तार में,
किस ने फेंका है ये पत्थर ज़ेहन के तालाब में
एक तूफ़ाँ सा बपा है अब मेंरे अफ़्कार में,
तेरे चेहरे पर नज़र आते हैं अपने ही नुक़ूश
है मेंरा दीदार भी शामिल तेरे दीदार में,
एक ज़मीं का चाँद फिर होगा दरीचों से तुलूअ
आसमाँ का चाँद छुप जाएगा जब अश्जार में,
तेरी आमद आमद ए फ़स्ल ए बहाराँ बन गई
फूलों से खिलने लगे मेरे दर ओ दीवार में,
मेरे शेरों में न ढल पाता तेरा अक्स ए जमील
ये समुंदर क्या सिमटता कूज़ा ए इज़्हार में..??
~सलीम बेताब
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