ज़िन्दा है जब तक मुझे बस गुनगुनाने है
क्यूँकि गीत तेरे नाम के बड़े ही सुहाने है,
है सज़्दा, कभी रुकूअ, तो क़याम कभी
ये सब तो बस तुमसे मिलने के बहाने है,
कुछ लोग है कि पहचान से भी है आरी
एक आप है कि हाल ए दिल भी जाने है,
मुझको इन बादलों की चाल ये बताती है
तूने इन्हें आज खाकशारों पे बरसाने है,
हम तो समझ बैठे थे दुनिया को सब कुछ
बाद इसके आने अभी और भी ज़माने है,
दौर ए ऐतबार ओ बे ऐतबारी के दरमियाँ
हम तो बस तुझे ही अपना सबकुछ माने है,
एक नशा तेरे जाम का ही खींचता है मुझे
वरना तो इस शहर में और भी मैख़ाने है,
तेरे ही जाम की तलब हर तिश्ना लब को
फिर क्यूँ बना रखे यहाँ और भी पैमाने हैं ?
एक तुम ही नहीं हो गुलाम उसके नवाब
ये सारे जहाँ वाले भी तो उसी के दीवाने है..!!
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