वस्ल की आख़िरी मंज़िल है फ़ना हो जाना
तुझ से मिल कर तेरे बंदे का ख़ुदा हो जाना,
शम्अ से मिल के ज़रा देख तो परवाने का रंग
कितना मुश्किल है कोई फ़र्क़ ज़रा हो जाना,
हम तो परछाई हैं बस इश्क़ की ऐ तेग़ ए वक़्त
हम को काटे से भला इश्क़ का क्या हो जाना,
ज़िंदगी को तो समझते हैं हम एक चाल तेरी
मौत है इस का जवाब उस पे फ़िदा हो जाना,
मुश्तरी ज़ोहरा ज़ुहल शम्स ओ हिलाल ओ मिर्रीख़
तेरे कूचे को है यूँ राह ए वफ़ा हो जाना..!!
~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स
अपना तुम्हें बनाना था कह कर बना लिया
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