शाम ए ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं
हम आ भी जा आ भी जा आज मेरे सनम,
दिल परेशान है रात वीरान है
देख जा किस तरह आज तन्हा हैं हम,
चैन कैसा जो पहलू में तू ही नहीं
मार डाले न दर्द ए जुदाई कहीं,
रुत हसीं है तो क्या चाँदनी है तो क्या
चाँदनी ज़ुल्म है और जुदाई सितम,
अब तो आ जा कि अब रात भी सो गई
ज़िंदगी ग़म के सहराओं में खो गई,
ढूँढती है नज़र तू कहाँ है मगर
देखते देखते आया आँखों में दम..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं






























1 thought on “शाम ए ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं”