किताब सादा रहेगी कब तक ?

किताब सादा रहेगी कब तक ?
कभी तो आगाज़ ए बाब होगा,

जिन्होंने बस्तियाँ उजाड़ी है
कभी तो उनका हिसाब होगा,

वो दिन गए जब कि हर सितम को
अदा ए महबूब कह के चुप थे,

उठी जो अब हम पे ईंट कोई
तो इस का पत्थर जवाब होगा,

सहर की खुशियाँ मनाने वालो
सहर के तेवर बता रहे है,

अभी तो इतनी घुटन बढ़ेगी
कि साँस लेना आज़ाब होगा,

सकूत ए सहरा में बसने वालो
ज़रा रुतों का मिज़ाज समझो !

जो आज का दिन सुकूं से गुज़रा
तो कल का मौसम ख़राब होगा,

नहीं कि ये सिर्फ़ शायरी है
ग़ज़ल में तारीख बेहिसी है,

जो आज अशआर में कह दिया है
वो कल शरीक़ ए निसाब होगा..!!


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