क़र्ज़ जाँ का उतारने के लिए
मैं जीया ख़ुद को मारने के लिए,
मुझे जलना पड़ा दीये की तरह
शब की ज़ुल्फे सँवारने के लिए,
देख ! ख़ुद को मिटा दिया मैंने
नक्श तेरे उभारने के लिए,
मैंने दहलीज पर धरी आँखे
तुझको दिल में उतारने के लिए,
उसने तोहफ़ा दिया उदासी का
वक़्त ख़ुशी ख़ुशी गुज़ारने के लिए,
फिर भी इस मुहब्बत के खेल में
मैं हूँ तैयार उससे हारने के लिए..!!
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याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बाद

कहीं बे ख़याल हो कर युंही छू लिया किसी ने

जिस तरह चढ़ता है उसी तरह उतरता है

रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो…

दस्त ए मुनइम मेरी मेहनत का ख़रीदार सही

सियासत मुफ़ादात में खो गई है

मोहब्बत के सिवा हर्फ़ ओ बयाँ से कुछ नहीं होता

शिकवा भी ज़फ़ा का कैसे करे एक नाज़ुक सी दुश्वारी है…

यहाँ शोर बच्चे मचाते नहीं हैं…

फ़ना के तीर हवा के परों में रखे हैं
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