क़र्ज़ जाँ का उतारने के लिए
मैं जीया ख़ुद को मारने के लिए,
मुझे जलना पड़ा दीये की तरह
शब की ज़ुल्फे सँवारने के लिए,
देख ! ख़ुद को मिटा दिया मैंने
नक्श तेरे उभारने के लिए,
मैंने दहलीज पर धरी आँखे
तुझको दिल में उतारने के लिए,
उसने तोहफ़ा दिया उदासी का
वक़्त ख़ुशी ख़ुशी गुज़ारने के लिए,
फिर भी इस मुहब्बत के खेल में
मैं हूँ तैयार उससे हारने के लिए..!!
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वो दर्द वो वफ़ा वो मुहब्बत तमाम शुद

तस्वीर का रुख एक नहीं दूसरा भी है…

ग़म ए जहाँ को शर्मसार करने वाले क्या हुए

फिरते हैं जिस के वास्ते हम दर ब दर अभी

कल यूँ ही तेरा तज़किरा निकला…

इससे पहले कि कोई इनको चुरा ले

एक शख्स की खातिर ज़बर कर बैठा हूँ…

यूँ तो हँसते हुए लड़कों को भी ग़म होता है

मसरूफ़ियत उसी की है फ़ुर्सत उसी…

साथ मुझको ही पाओगे जिधर जाओगे…



















