क़र्ज़ जाँ का उतारने के लिए
मैं जीया ख़ुद को मारने के लिए,
मुझे जलना पड़ा दीये की तरह
शब की ज़ुल्फे सँवारने के लिए,
देख ! ख़ुद को मिटा दिया मैंने
नक्श तेरे उभारने के लिए,
मैंने दहलीज पर धरी आँखे
तुझको दिल में उतारने के लिए,
उसने तोहफ़ा दिया उदासी का
वक़्त ख़ुशी ख़ुशी गुज़ारने के लिए,
फिर भी इस मुहब्बत के खेल में
मैं हूँ तैयार उससे हारने के लिए..!!
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं

अफ़सोस तुम्हें कार के शीशे का हुआ है

या रब मेरी हयात से ग़म का असर न जाए

धड़कन धड़कन यादों की बारात…

कभी झिड़की से कभी प्यार से समझाते रहे

मैंने पल भर में यहाँ लोगो को बदलते हुए देखा है…

होंठों को फूल आँख को बादा नहीं कहा

एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा

आयत ए हिज्र पढ़ी और रिहाई पाई

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तेरा ख़याल भी

तुम्हारे हिज़्र में है ज़िन्दगी दुश्वार….



















