क़र्ज़ जाँ का उतारने के लिए
मैं जीया ख़ुद को मारने के लिए,
मुझे जलना पड़ा दीये की तरह
शब की ज़ुल्फे सँवारने के लिए,
देख ! ख़ुद को मिटा दिया मैंने
नक्श तेरे उभारने के लिए,
मैंने दहलीज पर धरी आँखे
तुझको दिल में उतारने के लिए,
उसने तोहफ़ा दिया उदासी का
वक़्त ख़ुशी ख़ुशी गुज़ारने के लिए,
फिर भी इस मुहब्बत के खेल में
मैं हूँ तैयार उससे हारने के लिए..!!
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अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रखा है…

मेरे उसके दरमियाँ ये राब्ता है और बस

दिल भी बुझा हो शाम की परछाइयाँ भी हों

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के…

आज ज़रा फुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया

ज़िन्दगी की कशमकश से परेशान बहुत है

हुस्न को दिल में छुपा कर देखो

गरेबाँ दर गरेबाँ नुक्ता आराई भी होती है

बारहा तुझ से कहा था मुझे अपना न बना

दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं
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