क़र्ज़ जाँ का उतारने के लिए
मैं जीया ख़ुद को मारने के लिए,
मुझे जलना पड़ा दीये की तरह
शब की ज़ुल्फे सँवारने के लिए,
देख ! ख़ुद को मिटा दिया मैंने
नक्श तेरे उभारने के लिए,
मैंने दहलीज पर धरी आँखे
तुझको दिल में उतारने के लिए,
उसने तोहफ़ा दिया उदासी का
वक़्त ख़ुशी ख़ुशी गुज़ारने के लिए,
फिर भी इस मुहब्बत के खेल में
मैं हूँ तैयार उससे हारने के लिए..!!
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सफ़र ए मंज़िल ए शब याद नहीं

यूँ ही उम्मीद दिलाते है ज़माने वाले…

ये क़र्ज़ तो मेरा है चुकाएगा कोई और…

नदी में बहते थे नीलम ज़मीन धानी थी

ज़िन्दगी का बोझ उठाना पड़ेगा…

मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते

रात दरपेश थी मुसाफ़िर को

किस को रौशन बना रहे हो तुम

दिल है सहरा से कुछ उदास बहुत

ख़ुद हो गाफ़िल तो अक्सर ये भी भूल जाते है


















