कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया
फिर हुआ यूँ वो किसी की मैं किसी का हो गया,
इश्क़ कर के देखिए अपना तो ये है तजरबा
घर मोहल्ला शहर सब पहले से अच्छा हो गया,
क़ब्र में हक़गोई बाहर मंक़बत क़व्वालियाँ
आदमी का आदमी होना तमाशा हो गया,
वो ही मूरत वो ही सूरत वो ही क़ुदरत की तरह
उस को जिस ने जैसा सोचा वो भी वैसा हो गया..!!
~निदा फ़ाज़ली
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