जहाँ हैं महबूस अब भी हम वो हरम सराएँ नहीं रहेंगी
लरज़ते होंटों पे अब हमारे फ़क़त दुआएँ नहीं रहेंगी,
ग़सब शुदा हक़ पे चुप न रहना हमारा मंशूर हो गया है
उठेगा अब शोर हर सितम पर दबी सदाएँ नहीं रहेंगी,
हमारे अज़्म ए जवाँ के आगे हमारे सैल ए रवाँ के आगे
पुराने ज़ालिम नहीं टिकेंगे नई बलाएँ नहीं रहेंगी,
ये क़त्ल गाहें ये अद्ल गाहें इन्हें भला किस तरह सराहें
ग़ुलाम आदिल नहीं रहेंगे ग़लत सज़ाएँ नहीं रहेंगी,
बने हैं जो ख़ादिमान ए मिल्लत वो करना सीखें हमारी इज़्ज़त
वगर्ना उन के तनों पे भी ये सजी क़बाएँ नहीं रहेंगी..!!
~हबीब जालिब
महताब सिफ़त लोग यहाँ ख़ाक बसर हैं
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