इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए
जब तक किसी समर को मिरा दिल कहा न जाए,
शाख़ों पे नोक ए तेग़ से क्या क्या खिले हैं फूल
अंदाज़ ए लाला कारी ए क़ातिल कहा न जाए,
किस के लहू के रंग हैं ये ख़ार शोख़ रंग
क्या गुल कतर गई रह ए मंज़िल कहा न जाए,
बाराँ के मुंतज़िर हैं समुंदर पे तिश्नालब
अहवाल ए मेज़बानी ए साहिल कहा न जाए,
मेरे ही संग ओ ख़िश्त से तामीर ए बाम ओ दर
मेरे ही घर को शहर में शामिल कहा न जाए,
ज़िंदाँ खुला है जब से हुए हैं रिहा असीर
हर गाम है वो शोर ए सलासिल कहा न जाए,
हम अहल ए इश्क़ में नहीं हर्फ़ ए गुनह से कम
वो हर्फ़ ए शौक़ जो सर ए महफ़िल कहा न जाए,
जिस हाथ में है तेग़ ए जफ़ा उस का नाम लो
मजरूह से तो साए को क़ातिल कहा न जाए..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
ख़ंजर की तरह बू ए समन तेज़ बहुत है
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं






























1 thought on “इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए”