इंसाफ़ से न महरूम अब कोई शख्स रहेगा
दुनियाँ में जो जैसा करेगा, वो वैसा ही भरेगा,
कागज़ की जो हो नाव वो कब तलक चलेगी ?
कोह ए सितम का भी निशाँ पल में मिटेगा,
हर शब के गुज़रने पर सहर हो कर रहेगी
जो दुःख मिला है तो कभी सुख भी मिलेगा,
शैतान के हर मकर से तुम ख़ुद को बचाना
जो नेक राहों पे चलेगा बस वही ऐश करेगा,
हर शाख़ पे है उल्लू क्यूँ न हो फ़िक्र चमन की
गफ़लत में जो रहोगे तो ये चमन भी न बचेगा,
कहीं धूप कहीं छाँव यही है असरर ए ज़िन्दगी
पुख्ता जो यकीं हो तो चमन क्यूँ न खिलेगा..!!
~नवाब ए हिन्द
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