हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए
इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए,

हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है
तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए,

तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से
है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए,

है मोहब्बत भी अजब तर्ज़ ए तिजारत कि यहाँ
हर दुकाँ दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए..!!

~यासिर ख़ान इनाम

एक छोटा सा ख़्वाब था जो पूरा नहीं हुआ

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