हों जो सारे दस्त ओ पा हैं ख़ूँ मैं नहलाए हुए
हम भी हैं ऐ दिल बहाराँ की क़सम खाए हुए,
ख़ब्त है ऐ हमनशीं अक़्ल ए हरीफ़ान ए बहार
है ख़िज़ाँ इन की इन्हें आईना दिखलाए हुए,
क्या है ज़िक्र ए आतिश ओ आहन कि गद्दारान ए गूल
मारते हैं हाथ अंगारों पे घबराए हुए,
ज़िंदगी की क़द्र सीखी शुक्रिया तेग़ ए सितम
हाँ हमें थे कल तलक जीने से उकताए हुए,
सैर ए साहिल कर चुके ऐ मौज ए साहिल सर न मार
तुझ से क्या बहलेंगे तूफ़ानों के बहलाए हुए,
है यही एक कारोबार ए नग़्मा ओ मस्ती कि हम
या ज़मीं पर या सर ए अफ़्लाक हैं छाए हुए,
साज़ उठाया जब तो गरमाते फिरे ज़र्रों के दिल
जाम हाथ आया तो महर ओ मह के हमसाए हुए,
दश्त ओ दर बनने को हैं मजरूह मैदान ए बहार
आ रही है फ़स्ल ए गुल परचम को लहराए हुए..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
जिस दम ये सुना है सुब्ह ए वतन महबूस फ़ज़ा ए ज़िंदाँ में
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