दिल में जो था वो हो गया मुझ को सुना के चुप
सुन कर हुआ हूँ उस को मैं आँसू बहा के चुप,
कहता था अपना हाल मैं तुम को सुनाऊँगा
न जाने क्यों वो हो गया आँसू बहा के चुप,
मैं ने तो बेवफ़ाई का छेड़ा था तज़्किरा
मुँह पे लगा के उँगली फिर उस ने कहा कि चुप,
उस की किसी भी बात का मतलब भी कुछ नहीं
हो जाएगा वो देखना ख़ुद बड़बड़ा के चुप,
ख़ामोशियों की सिसकियों में शोर था बहुत
तन्हाइयों में हो गया वो गुनगुना के चुप,
कुछ दिन से अपने आप से था मैं दुखी बहुत
इरशाद रो के हो गया ख़ुद को हँसा के चुप..!!
~इरशाद अज़ीज़
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