धरती पर जब ख़ूँ बहता है बादल…

धरती पर जब ख़ूँ बहता है बादल रोने लगता है
देख के शहरों की वीरानी जंगल रोने लगता है,

लाख करे वो ज़ब्त का दा’वा वक़्त ए रुख़्सत सब बेकार
आँखें चाहें रोएँ न रोएँ काजल रोने लगता है,

बेटी की ज़िद के आगे माँ चुप हो जाती है लेकिन
नंगे सर की महरूमी पर आँचल रोने लगता है,

ख़ुश्बू ख़ुश्बू लिपटे रहना साँपों की मजबूरी है
वर्ना अपनी बे क़दरी पर संदल रोने लगता है,

तुझ से बिछड़ कर ग़ैर के आगे रोए हों तो हम मुजरिम
दिल का क्या है दिल पागल है पागल रोने लगता है..!!

~नवाज़ देवबंदी


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