दिल यार का तख़्त हुआ ही नहीं
जीवन ख़ुश बख़्त हुआ ही नहीं,
इसे तोड़ना भी तो नर्मी से
ये दिल कभी सख़्त हुआ ही नहीं,
आँखों ने बहुत इसरार किया
सपना दो लख़्त हुआ ही नहीं,
हम हँस कर उसे रुला देते
वो और करख़्त हुआ ही नहीं,
तुझ शहर तुझे हम आ मिलते
कोई साज़ ओ रख़्त हुआ ही नहीं,
हम छाँव बिछाते दूर तलक
कोई हर्फ़ दरख़्त हुआ ही नहीं,
मिट्टी के माधो रहे सदा
हम सा कज बख़्त हुआ ही नहीं..!!
~आमिर सुहैल
सिसकियों हिचकियों आहों की फ़रावानी में
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