दस्त ए मुनइम मेरी मेहनत का ख़रीदार सही
कोई दिन और मैं रुस्वा सर ए बाज़ार सही,
फिर भी कहलाऊँगा आवारा ए गेसू ए बहार
मैं तेरा दाम ए ख़िज़ाँ लाख गिरफ़्तार सही,
जस्त करता हूँ तो लड़ जाती है मंज़िल से नज़र
हाइल ए राह कोई और भी दीवार सही,
ग़ैरत ए संग है साक़ी ये गुलू ए तिश्ना
तेरे पैमाने में जो मौज है तलवार सही,
मैं ने देखी देखी उसी में ग़म ए दौराँ की झलक
बे ख़बर रंग ए जहाँ से निगह ए यार सही,
उन से बिछड़े हुए मजरूह ज़माना गुज़रा
अब भी होंटों में वही गर्मी ए रुख़्सार सही..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
सिखाएँ दस्त ए तलब को अदा ए बेबाकी
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं





























