घुटन भी देख रही है मुझे हैरानी से
घुटन भी देख रही है मुझे हैरानी से कहीं मैं ऊब ही जाऊँ न उस जवानी से, सज़ा
Occassional Poetry
घुटन भी देख रही है मुझे हैरानी से कहीं मैं ऊब ही जाऊँ न उस जवानी से, सज़ा
इस मिट्टी को ऐसे खेल खिलाया हम ने ख़ुद को रोज़ बिगाड़ा रोज़ बनाया हम ने, जो सोचा
इसी लिए तो नहीं कटती रात आदमी की ख़ुदा की ज़ात से मुश्किल है ज़ात आदमी की, नए
है सफ़र में कारवान बहर ओ बर किस के लिए हो रहा है एहतिमाम ए ख़ुश्क ओ तर
निराला अजब नकचढ़ा आदमी हूँ जो तुक की कहो बेतुका आदमी हूँ, बड़े आदमी तो बड़े चैन से
दे रहे हैं जिस को तोपों की सलामी आदमी क्या कहूँ तुम से कि है कितना हरामी आदमी,
ये मत पूछो कि कैसा आदमी हूँ करोगे याद, ऐसा आदमी हूँ, मेरा नाम ओ नसब क्या पूछते
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा, इतना
राहज़न आदमी रहनुमा आदमी बार हा बन चुका है ख़ुदा आदमी, हाए तख़्लीक़ की कार पर्दाज़ियाँ ख़ाक सी
कहानी ठीक बनती है नज़ारें ठीक मिलते हैं अमूमां वक़्त अच्छा हो तो सारे ठीक मिलते हैं, वजह