अपनों को नहीं समझा अपना बेगाना समझ कर छोड़ दिया
अपनों को नहीं समझा अपना बेगाना समझ कर छोड़ दिया अफ़्सोस हक़ीक़त को तुम ने अफ़्साना समझ के
Occassional Poetry
अपनों को नहीं समझा अपना बेगाना समझ कर छोड़ दिया अफ़्सोस हक़ीक़त को तुम ने अफ़्साना समझ के
आरज़ू ,हसरत, तमन्ना, मुद्दआ कोई नहीं जब से तुम हो मेरे दिल में दूसरा कोई नहीं, बेवफ़ाई का
मेरे दर्द की तुझे क्या ख़बर है जिसे ख़बर कोई और है तू इलाज रहने दे चारागर मेरा
रखते हैं दुश्मनी भी जताते हैं प्यार भी हैं कैसे ग़म गुसार मेरे ग़म गुसार भी, अफ़्सुर्दगी भी
जान जब तक फ़िदा नहीं होती पूरी रस्म ए वफ़ा नहीं होती, शीशा टूटे तो होती है आवाज़
बेवफ़ा से भी प्यार होता है यार कुछ भी हो यार होता है, साथ उस के जो है
दस्तूर मोहब्बत का सिखाया नहीं जाता ये ऐसा सबक़ है जो पढ़ाया नहीं जाता, कमसिन हैं वो ऐसे
मौत की सुन के ख़बर प्यार जताने आए रूठे दुनिया से जो हम यार मनाने आए, अच्छे दिन
ये कह के आग वो दिल में लगाए जाते हैं चराग़ ख़ुद नहीं जलते जलाए जाते हैं, अब
हम ने फूलों को जो देखा लब ओ रुख़्सार के बाद फूल देखे न गए हुस्न ए रुख़