लगा जब अक्स ए अबरू देखने दिलदार…
लगा जब अक्स ए अबरू देखने दिलदार पानी में बहम हर मौज से चलने लगी तलवार पानी में,
Occassional Poetry
लगा जब अक्स ए अबरू देखने दिलदार पानी में बहम हर मौज से चलने लगी तलवार पानी में,
किस के नाम लिखूँ जो अलम गुज़र रहे हैं मेरे शहर जल रहे हैं मेरे लोग मर रहे
मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन नई तस्वीर न हो ये आते जाते रंग न हों
क़िस्मत का लिखा मिटा नहीं सकते अनहोनी को होनी बना नहीं सकते, ज़माने में हस्ब ए आरज़ू किसी
वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है अकेला जब भी होता हूँ मुझे घर याद आता
वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र है ख़तरे में हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर
न ज़रूरत है दवा की न दुआ की दोस्तों ! दिल की गहराई से ज्यादा दर्द के फोड़े
ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम, होने को
ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बेख़बर नहीं, अब तो
आ जाए वो मिलने तो मुझे ईद मुबारक मत आए ब हर हाल उसे ईद मुबारक, ऐसा हो