कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए

कैसे कहे, क्या कहे

कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए हम अल्फाज़ ढूँढ़ते रहे, वो बात अपनी कह गए,

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें

dukh fasana nahi ki

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें, आज तक अपनी

क़ुबूल है अब तो ज़िन्दगी का हर तोहफ़ा

क़ुबूल है अब तो

क़ुबूल है अब तो ज़िन्दगी का हर तोहफ़ा मैंने ख्वाहिशो का नाम बताना छोड़ दिया, जो दिल के

गम ए तन्हाई में राहत ए दिल का सबब है

गम ए तन्हाई में

गम ए तन्हाई में राहत ए दिल का सबब है एक ये चंचल सी हवा और अँधेरी रात,

ये एक बात समझने में रात हो गई है

ये एक बात समझने

ये एक बात समझने में रात हो गई है मैं उससे जीत गया हूँ कि मात हो गई

यहाँ किसे ख़बर है कि ये उम्र बस

यहाँ किसे ख़बर है

यहाँ किसे ख़बर है कि ये उम्र बस इसी पे गौर करने में कट रही है, कि ये

वो जो दिख रहा है सच हो ये ज़रूरी तो नहीं है

वो जो दिख रहा

वो जो दिख रहा है सच हो ये ज़रूरी तो नहीं है वो जो तुम कहते हो हक़

जो पूछती हो तो सुनो ! कैसे बसर होती है

जो पूछती हो तो

जो पूछती हो तो सुनो ! कैसे बसर होती है रात खैरात की, सदके की सहर होती है,

चेहरा देखें तेरे होंठ और पलकें देखे

चेहरा देखें तेरे होंठ

चेहरा देखें तेरे होंठ और पलकें देखे दिल पे आँखे रखे और तेरी साँसे देखें, सुर्ख लबो से

अज़ीब ख़्वाब था उसके बदन पे काई थी

azib khwab tha uske badan

अज़ीब ख़्वाब था उसके बदन पे काई थी वो एक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी, वो