शबनम है कि धोखा है कि झरना है कि तुम हो
शबनम है कि धोखा है कि झरना है कि तुम हो दिल दश्त में एक प्यास तमाशा है
Love Poetry
शबनम है कि धोखा है कि झरना है कि तुम हो दिल दश्त में एक प्यास तमाशा है
उधर की शय इधर कर दी गई है ज़मीं ज़ेर ओ ज़बर कर दी गई है, ये काली
तुम साथ चले थे तो मेरे साथ चला दिन तुम राह से बिछड़े थे कि बस डूब गया
क़दम रखता है जब रास्तो पे यार आहिस्ता आहिस्ता तो छट जाता है सब गर्द ओ ग़ुबार आहिस्ता
खफ़ा मत हो अभी तो प्यार के दिन है इब्तिदा ए मुहब्बत में अभी मल्हार के दिन है,
शब ए हिज्राँ की तवालत से घबरा गया हूँ मैं उसके अंदाज़ ए मुहब्बत से घबरा गया हूँ
कुछ बात है कि आज ख्याल ए यार आया एक बार नहीं बल्कि बार बार आया, भूल चुका
न जाने कैसा जादू कर गई है तेरी मुक़द्दस आँखे तेरे सिवा और किसी की तरफ़ अब देखा
उदास एक मुझी को तो कर नही जाता वह मुझसे रुठ के अपने भी घर नही जाता, वह
क्या सरोकार अब किसी से मुझे वास्ता था तो था बस तुझी से मुझे, बेहिसी का भी अब