चल निकलती हैं ग़म ए यार से बातें क्या क्या

चल निकलती हैं ग़म

चल निकलती हैं ग़म ए यार से बातें क्या क्या हम ने भी कीं दर ओ दीवार से

जैसा नज़र का शौक़ था वैसा न कर सका

जैसा नज़र का शौक़

जैसा नज़र का शौक़ था वैसा न कर सका शहर करिश्मा साज़ तमाशा न कर सका, दुनिया ने

हाल में अपने मगन हो फ़िक्र ए आइंदा न हो

हाल में अपने मगन

हाल में अपने मगन हो फ़िक्र ए आइंदा न हो ये उसी इंसान से मुमकिन है जो ज़िंदा

कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़ ए यार के

कभी अपने इश्क़ पे

कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़ ए यार के यूँही बीत जाएँगे ये भी दिन जो

ऐ जुनूँ कुछ तो खुले आख़िर मैं किस मंज़िल में हूँ

ऐ जुनूँ कुछ तो

ऐ जुनूँ कुछ तो खुले आख़िर मैं किस मंज़िल में हूँ हूँ जवार ए यार मैं या कूचा

बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता

बता ऐ अब्र मुसावात

बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता हमारे गाँव में बरसात क्यूँ नहीं करता ? महाज़ ए इश्क़

पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा

पराई आग पे रोटी

पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा, अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार

देखो अभी लहू की एक धार चल रही है

देखो अभी लहू की

देखो अभी लहू की एक धार चल रही है बाज़ू कटे हैं फिर भी तलवार चल रही है,

बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है

बदन और रूह में

बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है कि हिस्सा इश्क़ में किस का बड़ा है ? हुजूम ए

अगर न रोये तो आँखों पे बोझ पड़ता है

अगर न रोये तो

अगर न रोये तो आँखों पे बोझ पड़ता है करें जो गिर्या तो रातों पे बोझ पड़ता है,