किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा
किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बांधेगा ?
Life Poetry
किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बांधेगा ?
ये है तो सब के लिए हो ये ज़िद हमारी है इस एक बात पे दुनिया से जंग
संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे इस लोक को भी अपना न सके उस
कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं बहुत आगे गए बाक़ी जो हैं तय्यार बैठे
ऐ जुनूँ तेरा अभी तक न मुक़द्दर बदला शहर बदला न किसी हाथ का पत्थर बदला, ज़िंदगी बख़्श
राहें वीरान तो उजड़े हुए कुछ घर होंगे दश्त से बढ़ के मेंरे शहर के मंज़र होंगे, यूँ
दिल की दुनिया में दुनिया न आये कभी मेरे मौला ये दुनिया न भाये कभी, जिस को क़ुरआँ
फिर हरीफ़ ए बहार हो बैठे जाने किस किस को आज रो बैठे, थी मगर इतनी राएगाँ भी
सोच बदल जाती है,हालात बदल जाते हैं वक्त के साथ,लोगो के ख्यालात बदल जाते हैं, इस तरह चेहरे
उजड़े हुए हड़प्पा के आसार की तरह ज़िन्दा हैं लोग वक़्त की रफ़्तार की तरह, क्या रहना ऐसे