राहें वीरान तो उजड़े हुए कुछ घर होंगे
दश्त से बढ़ के मेंरे शहर के मंज़र होंगे,
यूँ ही तामीर अगर होते रहे शीशमहल
एक दिन शहर की हर राह में पत्थर होंगे,
दश्त में हम ने ये माना कि मिलेंगे वहशी
शहर वालों से तो हर हाल में बेहतर होंगे,
क्या ख़बर थी कि गुलाबों से हसीं होंठों पर
ज़हर में डूबे हुए तंज़ के नश्तर होंगे,
तेरे इंसाफ़ का मेआर यही कहता है
जितने इल्ज़ाम भी होंगे वो मेंरे सर होंगे,
हाल ए दिल कहने से पहले हमें मालूम न था
तेरी आँखों में भी अश्कों के समुंदर होंगे..!!
~शायर जमाली
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