रोज़मर्रा वही सब ख़बर देख कर…

रोज़मर्रा वही सब ख़बर

रोज़मर्रा वही सब ख़बर देख कर अब तो पत्थर हुआ ये ज़िगर देखिए, सड़के चलने लगी आदमी रुक

ज़िन्दगी का बोझ उठाना पड़ेगा…

zindagi ka bojh uthana padega

ज़िन्दगी का बोझ उठाना पड़ेगा गर ज़िन्दा हो तो दिखाना पड़ेगा, लगने लगे जो मसला ये ज़िन्दगी तो

अश्क जब हम बहाने लगते हैं…

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अश्क जब हम बहाने लगते हैं कितने ही गम ठिकाने लगते हैं आईना ले के निकले जब जब

तमाम उम्र कटी उसकी मेज़बानी में

tamam umr kati uski

तमाम उम्र कटी उसकी मेज़बानी में बिछड़ गया था कभी जो भरी जवानी में, हमारे होने तलक सब

किसी कमज़ोर की जब भी दुआएँ गूँज उठती है

किसी कमज़ोर की जब

किसी कमज़ोर की जब भी दुआएँ गूँज उठती है अबाबीलों के लश्कर से फज़ाएँ गूँज उठती है, ख़ामोशी

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है

तू इस क़दर मुझे

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है, जिसे ना

मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन एक दिन तो हल होती है

mushkil chahe laakh ho

मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन एक दिन तो हल होती है ज़िन्दा लोगों की दुनिया में अक्सर हलचल

लेना देना ही क्या फिर ऐसे यारो से ?

लेना देना ही क्या

लेना देना ही क्या फिर ऐसे यारो से ? सुख दुःख भी जब बाँटने हो दीवारों से, ज़िस्म

अब ज़िन्दगी पे हो गई भारी शरारतें…

ab zindagi pe ho gai bhari shararten

अब ज़िन्दगी पे हो गई भारी शरारतें तन्हाइयो ने छीन ली सारी शरारतें, होंठो के गुलिस्तान पे लाली

जब दुश्मनों के चार सू लश्कर निकल पड़े…

जब दुश्मनों के चार

जब दुश्मनों के चार सू लश्कर निकल पड़े हम भी कफ़न बाँध के सर पर निकल पड़े, जिन