बूढ़ा टपरा, टूटा छपरा और उस पर बरसातें सच
उसने कैसे काटी होगी, लंबी लंबी राते सच ?
अल्फाज़ की दुनियादारी में आँखों की सच्चाई क्या ?
मेरे सच्चे मोती झूठे, उसकी झूठी बातें सच,
कच्चे रिश्ते, बासी चाहत, और अधूरा अपनापन
मेरे हिस्से में आई है ऐसी भी सौगाते सच,
जाने क्यूँ मेरी नींदों के हाथ नहीं पीले होते
पलकों से लौटी है कितने सपनो की बरातें सच,
धोखा ख़ूब दिया है ख़ुद को झूठे मूठे किस्सों से
याद मगर जब करने बैठे याद आई है बातें सच..!!
~आलोक श्रीवास्तव
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