इश्क़ ने बख्शी है हमें ये सौगात मुसलसल
तेरा ही ज़िक्र हमेशा तेरी ही बात मुसलसल,
एक मुद्दत हुई मुझे तेरे कूँचे से निकले हुए
होती रहती है फिर भी मुलाकात मुसलसल,
यादों से दिल्लगी दिल की लगी बन जाती है
जब तसव्वुर में गुजरती है हर रात मुसलसल,
तुम्हारी मुहब्बत में आज उस मुकाम पर हूँ
जहाँ मेरी ज़ात में रहती है तेरी ज़ात मुसलसल..!!
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इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की

पैगम्बरों की राह पर चल कर न देखना

ताज़ा मोहब्बतों का नशा जिस्म-ओ-जाँ में है..

पा ब गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन

हिंदी कविता और ग़ज़लें

गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था

मैंने तुम्हे कितना सोचा ज़रीन कभी सोचा तुमने..

दिल की बर्बादी में शामिल थी रज़ा आँखों की

एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है

इश्क़ में जान से गुज़रते है गुज़रने वाले…
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