इंसानी सोच का मौसम बदलता रहता है
फ़ितूरी दिमाग बेकाम भी चलता रहता है,
ज़रा सी ओट ही बचाती है उसको बुझने से
हवा के दरमियाँ भी दीया जलता रहता है,
चल पड़े वही पहुँचते है अपनी मंज़िल तक
सफ़र को टालते रहने से टलता रहता है,
आलम ए ज़म्हुरियत में अब सोचना है शेरो को
दहाड़ने से भी जंगल दहलता रहता है..!!
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