रोग ऐसे भी गम ए यार से लग जाते है
दर से उठते है तो दीवार से लग जाते है,
इश्क़ आगाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है
बाद में सैकड़ो आज़ार से लग जाते है,
पहले पहले होस एक आध दुकां खोलती है
फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते है,
बे बसी भी कभी क़ुर्बत का सबब बनती है
रो न पाएँ तो गले यार से लग जाते है,
कतरनें गम की जो गलियों में उड़ी फिरती है
घर में ले आओ तो अंबार से लग जाते है,
दाग दामन के हों, दिल के हों कि चेहरे के
कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते है..!!
~अहमद फ़राज़
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