जो समझाते भी आ कर वाइज़ ए बरहम तो क्या करते
हम इस दुनिया के आगे उस जहाँ का ग़म तो क्या करते ?
हरम से मय कदे तक मंज़िल ए यक उम्र थी साक़ी
सहारा गर न देती लग़्ज़िश ए पैहम तो क्या करते ?
जो मिट्टी को मिज़ाज ए गुल अता कर दें वो ऐ वाइज़
ज़मीं से दूर फ़िक्र ए जन्नत ए आदम तो क्या करते ?
सवाल उन का जवाब उन का सुकूत उन का ख़िताब उन का
हम उन की अंजुमन में सर न करते ख़म तो क्या करते ?
जहाँ मजरूह दिल के हौसले टूटें निगाहों से
वहाँ करते भी मर्ग ए शौक़ का मातम तो क्या करते..??
~मजरूह सुल्तानपुरी
शिगाफ़ ए ख़ाना ए दिल से ही रौशनी आई
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