चुना था उन की मोहब्बत ने आज़मा के मुझे
सुपुर्द ए ख़ाक किया आदमी बना के मुझे,
मैं अपने दिल में ख़ुद अपनी वफ़ा पे नादिम हूँ
उन्हें ख़ुशी न हुई ख़ाक में मिला के मुझे,
लगी में और लगाती है ख़ाक परवाना
मआल ए सोज़ ए मोहब्बत दिखा दिखा के मुझे,
ये मेरे दर्द ए तमन्ना की आज़माइश है
क़फ़स में छोड़ दिया गुलसिताँ से ला के मुझे,
वो बज़्म और मेरे बा’द जगमगा उट्ठी
बहुत चराग़ जलाए गए बुझा के मुझे,
नियाज़ मंद हूँ तौफ़ ए हरम भी कर लूँगा
जो वक़्त मिल गया सज्दों से नक़्श ए पा के मुझे,
बड़ा करम हो जो ऐसे में याद आ जाओ
सता रहे हैं बहुत नक़्श मा सिवा के मुझे,
ये एक दिन का नहीं उम्र भर का रोना है
ख़ुदा के वास्ते देखो न मुस्कुरा के मुझे,
फ़रोग़ देंगे कभी शमअ ए अंजुमन की तरह
अभी तो देख रहे हैं जला जला के मुझे,
मुदाम रहता है मख़मूर कैफ़ का आलम
करम किया मेरे साक़ी ने मय पिला के मुझे..!!
~मख़मूर देहलवी
हज़ार रंज हो दिल लाख दर्द मंद रहे
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