हज़ार रंज हो दिल लाख दर्द मंद रहे
ख़याल पस्त न हो हौसला बुलंद रहे,
ग़म ए फ़िराक़ में दिल क्यूँ न दर्द मंद रहे ?
बहार आ के गई हम क़फ़स में बंद रहे,
ख़ुदा की याद में दुनिया को भूल जा ऐ दिल
वो काम कर कि हर एक तर्फ़ सूद मंद रहे,
मिले कि कुछ न मिले माँगने से काम रखूँ
तेरी जनाब में दस्त ए दु’आ बुलंद रहे,
दिखाईं गर्दिश ए दौराँ ने सूरतें क्या क्या
मगर मुझे तो अकेले तुम्हीं पसंद रहे,
ग़ुरूर ए हुस्न उन्हें इन्किसार ए शेवा ए इश्क़
वो बे नियाज़ रहे हम नियाज़ मंद रहे,
जनाब ए शैख़ भी मख़मूर शब को रिंदों में
अजीब हाल से मसरूफ़ ए वा’ज़ ओ पंद रहे..!!
~मख़मूर देहलवी
दलाएल से ख़ुदा तक अक़्ल ए इंसानी नहीं जाती
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