आ ही जाएगी सहर मतला ए इम्काँ तो खुला
न सही बाब ए क़फ़स रौज़न ए ज़िंदाँ तो खुला,
ले के आई तो सबा उस गुल ए चीनी का पयाम
वो सही ज़ख़्म की सूरत लब ए ख़ंदाँ तो खुला,
सैल ए रंग आ ही रहेगा मगर ऐ किश्त ए चमन
ज़र्ब ए मौसम तो पड़ी बंद ए बहाराँ तो खुला,
दिल तलक पहुँचे न पहुँचे मगर ऐ चश्म ए हयात
बाद मुद्दत के तेरा पंजा ए मिज़्गाँ तो खुला,
दर्द का दर्द से रिश्ता है चलो ऐ मजरूह
आज यारों से ये एक उक़्दा ए आसाँ तो खुला..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए
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