ज़र्द मौसम के एक शजर जैसी

ज़र्द मौसम के एक शजर जैसी
सारी बस्ती है मेरे घर जैसी,

जब बिगड़ता है वक़्त इंसाँ का
छिपकली लगती है मगर जैसी,

साँस जैसे सफ़र में है राही
अपनी काया है रहगुज़र जैसी,

छूट जाता है रंग छूने से
ख़्वाहिशें तितलियों के पर जैसी,

और क्या हम ग़रीब रखते हैं
एक दौलत है बस हुनर जैसी,

ज़िंदगी आज के ज़माने में
बहर ए ज़ुल्मात के सफ़र जैसी,

है ज़मीर और जिस्म में अंजुम
कश्मकश कश्ती और भँवर जैसी..!!

~अशफ़ाक़ अंजुम


Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply