ज़बाँ सुख़न को सुख़न बाँकपन को तरसेगा
सुख़न कदा मेरी तर्ज़ ए सुख़न को तरसेगा,
नए पियाले सही तेरे दौर में साक़ी
ये दौर मेरी शराब ए कुहन को तरसेगा,
मुझे तो ख़ैर वतन छोड़ कर अमाँ न मिली
वतन भी मुझ से ग़रीब उल वतन को तरसेगा,
इन्ही के दम से फ़रोज़ाँ हैं मिल्लतों के चराग़
ज़माना सुहबत ए अरबाब ए फ़न को तरसेगा,
बदल सको तो बदल दो ये बाग़बाँ वर्ना
ये बाग़ साया ए सर्व ओ समन को तरसेगा,
हवा ए ज़ुल्म यही है तो देखना एक दिन
ज़मीन पानी को सूरज किरन को तरसेगा..!!
~नासिर काज़मी
मुमकिन नहीं मता ए सुख़न मुझ से छीन ले
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