वो दर्द वो वफ़ा वो मुहब्बत तमाम शुद
लिए दिल में तेरे क़ुर्ब की हसरत तमाम शुद,
ये बाद में खुलेगा कि किस किस का खून हुआ
हर एक बयान खत्म अदालत तमाम शुद,
तू अब तो दुश्मनी के भी क़ाबिल नहीं रहा
उठती थी जो कभी वो अदावत तमाम शुद,
अब रब्त एक नया मुझे आवारगी से है
पाबन्दी ख्याल की आदत तमाम शुद,
जायज़ थी या नहीं तेरे हक़ में थी मगर
करता था जो कभी वो वक़ालत तमाम शुद,
वो रोज़ रोज़ मरने का क़िस्सा हुआ तमाम
वो रोज़ दिल को चीरती वहशत तमाम शुद..!!
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