आख़िर वो मेरे क़द की भी हद…
आख़िर वो मेरे क़द की भी हद से गुज़र गया कल शाम में तो अपने ही साये से
आख़िर वो मेरे क़द की भी हद से गुज़र गया कल शाम में तो अपने ही साये से
गर्मी ए हसरत ए नाकाम से जल जाते हैं हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं,
गरेबाँ दर गरेबाँ नुक्ता आराई भी होती है बहार आए तो दीवानों की रुस्वाई भी होती है, हम
फ़सुर्दगी का मुदावा करें तो कैसे करें वो लोग जो तेरे क़ुर्ब ए जमाल से भी डरें, एक
एक जाम खनकता जाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है एक होश रुबा इनआ’म कि साक़ी रात गुज़रने
दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न
दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह, मैनें तुझसे चाँद
तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो