साज़ ए हस्ती की सदा ग़ौर से सुन
क्यूँ है ये शोर बपा ग़ौर से सुन,
दिन के हंगामों को बे कार न जान
शब के पर्दों में है क्या ग़ौर से सुन,
चढ़ते सूरज की अदा को पहचान
डूबते दिन की निदा ग़ौर से सुन,
क्यूँ ठहर जाते हैं दरिया सर ए शाम
रूह के तार हिला ग़ौर से सुन,
यास की छाँव में सोने वाले
जाग और शोर ज़रा ग़ौर से सुन,
हर नफ़स दाम ए गिरफ़्तारी है
नौ गिरफ़्तार ए बला ग़ौर से सुन,
दिल तड़प उठता है क्यूँ आख़िर ए शब
दो घड़ी कान लगा ग़ौर से सुन,
उसी मंज़िल में हैं सब हिज्र ओ विसाल
रह रव ए आबला पा ग़ौर से सन,
उसी गोशे में हैं सब दैर ओ हरम
दिल सनम है कि ख़ुदा ग़ौर से सुन,
का’बा सुनसान है क्यूँ ऐ वाइ’ज़
हाथ कानों से उठा ग़ौर से सुन,
मौत और ज़ीस्त के असरार ए रुमूज़
आमिरी बज़्म में आ ग़ौर से सुन,
क्या गुज़रती है किसी के दिल पर ?
तू भी ऐ जान ए वफ़ा ग़ौर से सन,
कभी फ़ुर्सत हो तो ऐ सुब्ह ए जमाल
शब गज़ीदों की दुआ ग़ौर से सन,
है यही साअत ए ईजाब ओ क़ुबूल
सुब्ह की लौ को ज़रा ग़ौर से सुन,
कुछ तो कहती हैं चटक कर कलियाँ
क्या सुनाती है सबा ग़ौर से सुन,
बर्ग ए आवारा भी एक मुतरिब है
ताइर ए नग़मा सरा ग़ौर से सुन,
रंग मिन्नत कश ए आवाज़ नहीं
कल भी है एक नवा ग़ौर से सुन,
ख़ामुशी हासिल ए मौसीक़ी है
नग़्मा है नग़्मा नुमा ग़ौर से सुन,
आइना देख के हैरान न हो
नग़्मा ए आब ए सफ़ा ग़ौर से सुन,
इश्क़ को हुस्न से ख़ाली न समझ
नाला ए अहल ए वफ़ा ग़ौर से सुन,
दिल से हर वक़्त कोई कहता है
मैं नहीं तुझ से जुदा ग़ौर से सुन,
हर क़दम राह ए तलब में नासिर
जरस ए दिल की सदा ग़ौर से सुन..!!
~नासिर काज़मी
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