रखते हैं दुश्मनी भी जताते हैं प्यार भी

रखते हैं दुश्मनी भी जताते हैं प्यार भी
हैं कैसे ग़म गुसार मेरे ग़म गुसार भी,

अफ़्सुर्दगी भी रुख़ पे है उनके निखार भी
है आज गुल्सिताँ में ख़िज़ाँ भी बहार भी,

पीता हूँ मैं शराब ए मोहब्बत तो क्या हुआ
पीता है ये शराब तो परवर दिगार भी,

मिलने की है ख़ुशी तो बिछड़ने का है मलाल
दिल मुतमइन भी आप से है बेक़रार भी,

आ कर वो मेरी लाश पे ये कह के रो दिए
तुम से हुआ न आज मेरा इंतिज़ार भी,

ऐ दोस्त बाद ए मर्ग भी मैं हूँ शिकस्ता हाल
दिल की तरह से टूटा हुआ है मज़ार भी,

पुरनम ये सब करम है क़मर का जो आज कल
होता है अहल ए फ़न में तुम्हारा शुमार भी..!!

~पुरनम इलाहाबादी

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